IIT से इंजीनियर, IPS, क्रिकेट और राजनीतिक सफर तय किया था अमिताभ चौधरी ने
AJ डेस्क: झारखंड कैडर के 1985 बैच के आईपीएस अधिकारी अमिताभ चौधरी एक ऐसा नाम है जो जहां भी रहा किसी पहचान का मोहताज नहीं हुआ। चाहे एकीकृत बिहार के दौरान रांची में एसएसपी की भूमिका रही हो या झारखंड में क्रिकेट को प्रमोट करने की बात रही हो। चाहे रांची में विश्व स्तर का जेएससीए स्टेडियम बनवाना हो या फिर झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन में प्रशासक का रोल रहा हो। सभी जगह अमिताभ चौधरी ने डंके की चोट पर काम किया।
एकीकृत बिहार के दौरान जब वह रांची के एसएसपी थे तब उन्होंने क्राइम कंट्रोल का ऐसा फार्मूला ईजाद किया कि अपराध की नगरी के रूप में मशहूर रांची के लोगों ने काफी राहत की सांस ली थी। यह वह दौर था जब रांची में सुरेंद्र बंगाली और अनिल शर्मा के दो ध्रुवों के बीच कई छोटे-छोटे क्राइम सेंटर थे। जिनका ‘प्रोफेशन’ रंगदारी वसूली और हत्या करना था।
मोस्ट वांटेड को किया था गिरफ्तार-
वरिष्ठ पत्रकार शम्भुनाथ चौधरी कहते हैं कि उस दौर में रांची एसएसपी के रूप में अमिताभ चौधरी ने एक तरफ जहां अनिल शर्मा को दिल्ली से गिरफ्तार किया वहीं दूसरी तरफ सुरेंद्र बंगाली को कोलकाता जाकर पकड़ा था। चौधरी बताते हैं कि वह दौर ऐसा था कि लोग इन दोनों अपराधियों के नाम से खौफ खाते थे। बड़े-बड़े व्यवसायियों से यह दोनों अपराधी ना केवल रंगदारी वसूलते थे बल्कि किसी को खत्म कर देना इनके लिए बाएं हाथ का खेल था। यह वह दौर था जब रांची में अपराधियों का खूनी खेल चरम पर था। उसी दौरान रांची के व्यस्ततम पर बाजार के कार्ड सराय इलाके में रांची पुलिस ने दिन के 10:30 बजे तीन अपराधियों का एनकाउंटर कर दिया था। चौधरी बताते हैं कि बंगाली को न केवल चौधरी ने अरेस्ट किया बल्कि उसकी सडक पर परेड करा दी ताकि लोगों के मन में उसको लेकर जो भय था वह समाप्त हो सके। यह ठीक वैसा ही था जैसा बॉलीवुड की फिल्मों में अक्सर देखने को मिलता है। दोनों अपराधी अभी तक जेल की सलाखों के बाहर नहीं निकल पाए हैं।
बल्ले की राजनीति में भी रहे शिखर पर-
चौधरी बताते हैं की अमिताभ चौधरी को क्रिकेट से खासा लगाव था लेकिन एकीकृत बिहार में उनकी एक नहीं चली। कई बार ऐसा मौका आया कि जमशेदपुर के कीनन स्टेडियम को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की मेजबानी का मौका मिला लेकिन टाटा की ‘ना’ के कारण वहां क्रिकेट मैच नहीं हो सके। ऐसे में अमिताभ चौधरी हाथ मलते रह गए। उसी समय उन्होंने रांची में एक अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम खड़ा करने का सपना देखा। राजधानी के धुर्वा इलाके में खड़ा झारखंड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन स्टेडियम उसी सपने का मूर्त रूप है। जहां अब तक कई अंतरराष्ट्रीय मैच हो चुके। स्थिति यह है कि अब कीनन स्टेडियम का जिक्र भी किसी की जुबान पर नहीं आता है। यही नहीं अमिताभ चौधरी इंडियन टीम के मैनेजर भी थे। साथ ही 3 साल तक बीसीसीआई के एक्टिंग सेक्रेटरी भी रहे।

होटवार स्थित खेलगांव का ब्लू प्रिंट तैयार करने में रही भूमिका-
अमिताभ चौधरी झारखण्ड सरकार में दो बार राज्य में खेल निदेशक भी रहे। पहले टर्म में उन्होंने खेल गांव का सपना सरकार को दिखाया और दूसरे टर्म में खेल गांव बनने के बाद वहां बाकायदा 34 वें राष्ट्रीय खेल का आयोजन भी किया गया। वह 2016 तक वह झारखण्ड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन के लगातार अध्यक्ष बने रहे। उनके हटने के बाद में भी उनके अभिभावकों में ही संस्था चलती रही।
संसदीय राजनीति में भी भाग्य आजमाया था-
हालांकि इस दौरान उन्होंने राजनीति में भी कैरियर तलाशा लेकिन सफलता नहीं मिली। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने तत्कालीन झारखंड विकास मोर्चा के टिकट से रांची संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। उसके बाद उनका संसदीय राजनीति से मोहभंग हो गया। वह वापस अपनी दुनिया में चले गए और क्रिकेट पॉलिटिक्स करने लगे।
दो साल तक रहे जेपीएससी के अध्यक्ष-
सरकार चाहे जिसकी भी रही हो उनकी दक्षता और कार्यकुशलता को लेकर वह हमेशा मजबूत रहे। यही वजह रही कि मौजूदा सरकार ने उन्हें झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन (जेपीएससी) का चेयरमैन नियुक्त किया। उनके 2 साल के कार्यकाल के दौरान ही 4 जेपीएससी परीक्षाएं आयोजित की गई। सातवीं से दसवीं तक की जेपीएससी परीक्षाओं के संचालन और उनके नतीजों का श्रेय भी अमिताभ चौधरी को जाता है।
हालांकि प्रोफेशनल जीवन के हर कोने में सफलता पाने वाले चौधरी का व्यक्तिगत जीवन बहुत सफल नहीं माना जाता है। उनकी पत्नी जो खुद एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी रही हैं उनके साथ चौधरी की कभी नहीं बनी एक बेटे और एक बेटी के पिता चौधरी परिवार से अलग ही रहा करते थे।
