झरिया में हो रही धन वर्षा, लूट सको तो लूट लो—– (अंदर और भी रोचक खबरें)
AJ डेस्क: लाख टके की अब क्या कीमत है। पहले “लाख” बोलने में सोचना भी पड़ता था। कोयले की राजधानी झरिया में दो लाख, तीन लाख या सात लाख रूपये बरामद होना कौन सी बड़ी बात है। घुमक्कड़ एक महीने पहले से महसूस कर रहा है कि धनबल के सहारे जमकर गुट बदलने का खेल शुरू हो चुका है। एक प्रत्याशी ऐसा भी है जिसे धनबल के सहारे कहें या धनबल पर ही चुनावी परिदृश्य बदलने का गुमान है। क्षेत्र में कोई जनाधार तो है नहीं, परिवार या रिश्तेदार में कुछ ऐसे सदस्य हैं जिनका चेहरा वोटर के सामने आएगा तो मिल रहा वोट भी गड़बड़ा जाएगा। प्रत्याशी तक तो सब ठीक है लेकिन उसके इर्द गिर्द के लोग सिर्फ और सिर्फ धनबल के भरोसे ही अपने प्रत्याशी को वैतरणी पार कराने की सोच रहे हैं।
एक नही दो दो मजबूत (आर्थिक रूप से) घराना खुलकर पैसे का खेल खेल रहा है। पैसे के बल पर ही केवल सेंधमारी करने में लगा है। उसे नही मालूम या अनुभव की कमी हो कि चुनावी मौसम में धन लेने वाले कभी अपना नही होते। कोयला, शराब, बालू, रंगदारी से अनाप शनाप इकट्ठा किया गया धन अभी खुलकर वोटरों को लुभाने के काम आ रहा है। जनता भी चालाक हो चुकी है। हो रही धन वर्षा को दोनों हाथ लूट रही है। जिला प्रशासन क्षेत्र बदल बदल कर सघन जाँच कर रही है। वह जहां जाँच करती है वहीं रुपया बरामद हो जा रहा है। लेकिन क्षेत्र में तो कई माध्यम से, कई स्रोत से धन इक्कठा हो रहे हैं और बंट रहे हैं। प्रशासन अब तक वहां पहुंच पाने में सफल नही हो सकी है।
“बाघ” ने चोला बदल दिया है जल ईश्वर ठंढे नजर आ रहे
चुनाव का मौसम है। एक छोटी सी गलती पूरा खेल बिगाड़ सकता है। महीना दिन खुद और समर्थको को अनुशासन में रहने की आदत डालने का कष्ट भोगने की हिदायत है। 16 दिसम्बर के बाद तो फिर बाघ दहाड़ेगा ही। चलिए टाइगर की मजबूरी तो समझ में आ गयी लेकिन माफिया राज को उखाड़ फेंकने का मिसाइल छोड़ने वाले जल ईश्वर ठंढे ठंढे पड़ते क्यों नजर आ रहे। जल ईश्वर ने तो अपने जमाने में अपने खास लोगों को “जल के खेल” में खूब लाभान्वित किया था। अब वह लाभुक नजर नही आ रहे। बे मौसम दहाड़ना और चुनाव के वक्त गरजने में काफी अंतर होता है।
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