Mon. Jun 1st, 2020

“मेरी मर्जी”: जिलाध्यक्ष हूँ ही, चाणक्य का ‘रबर स्टाम्प’ भी, फिर मैं चाहे जो करूँ—-

AJ डेस्क: जी हां, कोयलांचल की राजनीतिक फिजां में खूब चर्चा हो रही है। एक अनुशासित, सैद्धांतिक पार्टी के जिला के मुखिया तो जब से पद सम्भाले हैं, अजब गजब की चर्चा में बने ही रहे हैं लेकिन ताजा तरीन जो चर्चा है यह जबरदस्त TRP बटोर रहा है। बावजूद यह जनाब अपने आप में मस्त हैं, कोयलांचल के राजनीतिक चाणक्य का आशीर्वाद जो इन्हें प्राप्त है। तभी तो यह गुनगुनाते फिर रहे हैं-” मेरी मर्जी, मैं जो चाहूं सो करूँ, मेरी मर्जी”।

 

 

पार्टी कार्यालय का दृश्य। एक माननीय हत्थे से उखड़े हुए हैं। वहां पार्टी के बहुत सारे कार्यकर्ता भी मौजूद थे। माननीय ने जिलाध्यक्ष को फोन लगाया। दोनों ओर से बात बिगड़ने लगी। धीरे धीरे आवाज में तल्खी आने लगा। घटना के चश्मदीद गवाह तो बताते हैं कि माननीय इतने आक्रोश में थे कि जिलाध्यक्ष उस वक्त सामने पड़ जाता तो हाथापाई होना निश्चित था। बात यहीं नही रुकी, प्रदेश मुख्यालय तक पहुंच गयी। यही नही एक दो दिनों के बाद माननीय के समर्थक जिलाध्यक्ष की शिकायत लेकर “चाणक्य” के दरबार में भी पहुंच गए। वह शायद भूल गए थे कि चाणक्य के ही आशीर्वाद और रबर स्टाम्प बने रहने के कारण अब तक पार्टी के इस जिला के मुखिया का “सौ खून” माफ़ होता रहा है तो फिर इन कार्यकर्ताओं को न्याय मिलने की उम्मीद कहाँ से जग गयी।

 

 

 

 

मैथन में युवती के साथ विचरण करने, विवादास्पद महिला नेत्री को पार्टी के ही एक प्रकोष्ठ का महत्वपूर्ण पद दिलाने (हालाँकि तुरन्त हटाना भी पड़ा था), क्षेत्र में गन्दी छवि रखने वाली कई महिलाओं को संगठन में तरजीह देने जैसे मामलो को लेकर यह मुखिया जी संगठन के समर्पित, ईमानदार, कर्मठ नेता- कार्यकर्तओं की नजर में पहले से ही गिर चुके हैं। यह अलग बात है कि चाणक्य महोदय के कारण मुखिया का हर पाप, विवाद ढकता चला गया।

 

 

संगठन में पद लेना है। दाम दो। बेचा खूब बेचा। निरसा के ही एक चार-पांच फीट के चर्चित कार्यकर्ता की जायज-नाजायज सेवा लेकर उसे राजनीति में कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया। पार्टी के कुछ दिग्गज नेता उस पांच फिटिया बदनाम व्यक्तित्व को जिला कमिटी तक में नही आने देना चाह रहे थे। लेकिन हाय रे लक्ष्मी सेवा, वाहन सेवा और बंगाल सेवा। जो न करा दे।

 

 

विधान सभा चुनाव के एन पहले कोयलांचल से लेकर मुगल सराय मंडी तक फेमस चेहरा को इसी मुखिया ने माला पहना कर संगठन में शामिल कराया था। उस वक्त भी पार्टी के ईमानदार समर्पित नेता हैरान और परेशान थे। मिडिया ने भी खूब हाय तौबा मचाया लेकिन इस शख्स पर कोई फर्क नही पड़ा।

 

 

 

लम्बी फेहरिस्त है। आज नही कल जवाब तो देना ही पड़ेगा। संगठन के प्रदेश कार्यालय से मिलने वाले फंड में गड़बड़ झाला की महक मिल रही है। विधान सभा चुनाव में ही अपनी पार्टी के प्रत्याशियों के लिए मुखिया ने क्या किया, यह सर्वविदित है।

 

 

इस बार एक माननीय ने मुखिया के “मोनोपली” का कड़ा विरोध किया है। पहली बार शायद ऐसा हुआ है हालांकि यहां पुनः चाणक्य महोदय अपना दिमाग लगाने से बाज नही आ रहे। अब देखना यह है कि रबर स्टाम्प के कृत्यों को ढकने के चक्कर में चाणक्य महाराज अपना कितना नुकसान बर्दाश्त करते हैं।

(जारी—-)

 

 

 

 

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